"सोशल मीडिया स्टार आरक्षक के निलंबन से उठा जनाक्रोश" "पुलिस विभाग के फैसले पर जनता का सवाल: समाज को जागरूक करने वाले आरक्षक को क्यों किया निलंबित?"
शहडोल।
पुलिस अधीक्षक श्री रामजी श्रीवास्तव द्वारा यातायात शाखा में पदस्थ आरक्षक श्री विवेकानंद तिवारी को गत 15 दिनों से बिना सूचना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने तथा पुलिस रेग्यूलेशन के कथित उल्लंघन के आधार पर निलंबित किए जाने का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई से आगे बढ़कर जनचर्चा और जनभावनाओं का विषय बन गया है।
पुलिस विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार आरक्षक विवेकानंद तिवारी विभिन्न स्थानों पर वीडियो बनाकर उन्हें इंस्टाग्राम एवं अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड कर रहे थे। विभाग का आरोप है कि वे इस गतिविधि में निजी लाभ एवं प्रचार के उद्देश्य से संलग्न थे तथा ड्यूटी से अनुपस्थित पाए गए। साथ ही सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में वे निर्धारित पुलिस वर्दी के कुछ हिस्सों का उपयोग करते हुए दिखाई दिए, जिसे पुलिस रेग्यूलेशन 64 के तहत सेवा की सामान्य शर्तों का उल्लंघन माना गया।
हालांकि इस कार्रवाई के बाद सोशल मीडिया पर एक अलग ही तस्वीर सामने आ रही है। बड़ी संख्या में लोग आरक्षक विवेकानंद तिवारी के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य मंचों पर उनके समर्थकों द्वारा निलंबन को "कठोर" और "अनुचित" बताते हुए तत्काल बहाली की मांग की जा रही है।
समर्थकों का तर्क है कि विवेकानंद तिवारी अपने वीडियो के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने, यातायात नियमों की जानकारी देने तथा सकारात्मक संदेश प्रसारित करने का कार्य कर रहे थे। उनका कहना है कि यदि किसी कर्मचारी की कार्यशैली या अनुशासन संबंधी कोई कमी थी तो विभागीय स्तर पर सुधारात्मक कदम उठाए जा सकते थे, लेकिन सीधे निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई उचित नहीं प्रतीत होती।
सोशल मीडिया पर अनेक लोगों ने यह प्रश्न भी उठाया है कि विभिन्न विभागों में कार्यरत कई अधिकारी और कर्मचारी अपने नियमित कार्यों के साथ निजी गतिविधियां भी संचालित करते हैं। ऐसे में यदि कोई पुलिसकर्मी सामाजिक जागरूकता से जुड़े वीडियो बनाता है, तो उसके प्रति इतनी सख्त कार्रवाई क्यों की गई? हालांकि इस तुलना को लेकर अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं।
विवेकानंद तिवारी के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में फॉलोअर्स हैं और उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने कभी भी समाज विरोधी या आपत्तिजनक सामग्री का प्रचार नहीं किया, बल्कि युवाओं और आम नागरिकों को जागरूक करने का प्रयास किया। यही कारण है कि उनके निलंबन के बाद लोगों की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं।
दूसरी ओर पुलिस विभाग का स्पष्ट मत है कि प्रत्येक पुलिसकर्मी को सेवा नियमों और अनुशासन का पालन करना अनिवार्य है। विभागीय नियमों के उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसी आधार पर निर्णय लिया गया है।
अब यह मामला केवल एक कर्मचारी के निलंबन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सोशल मीडिया के दौर में सरकारी कर्मचारियों की अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत पहचान और सेवा अनुशासन के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस छेड़ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनभावनाओं और विभागीय नियमों के बीच इस विवाद का क्या निष्कर्ष निकलता है।
फिलहाल इतना तय है कि विवेकानंद तिवारी के निलंबन ने शहडोल संभाग में एक व्यापक चर्चा को जन्म दे दिया है और सोशल मीडिया पर उनकी बहाली की मांग लगातार तेज होती दिखाई दे रही है।

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